ابو داؤد
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ग़ुलामी ने बदल डाला भारतीय मुसलमानों का ज़मीर
بسم اللہ الرحمٰن الرحیم
अल्लामा एहसान इलाही ज़हीर ने क्या खूब कहा था
ख़ुद नहीं बदलते, कुरआन को बदल देते हैं
क्योंकि ग़ुलामी में बदल जाता है क़ौमों का ज़मीर।
ये सिर्फ़ एक शायरी नहीं, बल्कि एक कड़वी सच्चाई है जो बार-बार इतिहास में सामने आती रही है। और आज का भारतीय मुसलमान इसका ज़िंदा उदाहरण बन चुका है। सदियों की ग़ुलामी, मानसिक कमज़ोरी और अब लोकतांत्रिक ताग़ूती हुकूमत के साये में पले मुसलमान जो अपने इस्लाम की बुनियाद को भूल चुके हैं, वही आज "भारत माता" के पुजारी बन गए हैं।
यहां तक कि मोदी सरकार के समर्थक "जमाअत अहल-ए-हदीस" का अमीर असगर अली तो भारत को "पूरी दुनिया का बाप" तक कह देता है, जबकि यही भारत खुल्लमखुल्ला शिर्की तहज़ीब, कुफ़्री कानून और इस्लाम दुश्मन ताक़तों का गढ़ है।
वो मुसलमान जिनके बुज़ुर्गों ने "ला इलाहा इल्लल्लाह" के नाम पर अपना वतन, अपना घर और अपनी जानें क़ुर्बान कर दीं आज वही अपनी औलाद को सिखा रहे हैं कि "वतन से मोहब्बत ही असली दीन है", भारत माँ है, उससे मोहब्बत ईमान का हिस्सा है, और जो इसका विरोध करे, वो "गद्दार" है।
क्या ये वही लोग हैं जिनकी नसों में सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम के खून की झलक बाक़ी थी? नहीं! ग़ुलामी ने उनका ज़मीर बदल दिया। उनका एहसास मिटा दिया। और उनका दिल-ओ-दिमाग ताग़ूती चक्की में पीस डाला।
जब कोई हिंदुस्तान को "दारुलकुफ्र" कहता है, तो यही गुलाम-ज़मीर लोग तिलमिला उठते हैं। उनके चेहरे बिगड़ जाते हैं, उनकी ज़बानें ज़हर उगलने लगती हैं, और वो ऐसे मुसलमानों से नफ़रत करने लगते हैं जैसे वो खुद कोई हिन्दू हों।
इनकी हालत ये है कि वो कुरआन की इस हिदायत को भी भूल जाते हैं
وَلَا يَجْرِمَنَّكُمْ شَنَآنُ قَوْمٍ عَلَىٰ أَلَّا تَعْدِلُوا ۚ اعْدِلُوا هُوَ أَقْرَبُ لِلتَّقْوَىٰ
किसी क़ौम की दुश्मनी तुम्हें इस बात पर न उकसाए कि तुम इंसाफ़ छोड़ दो, इंसाफ़ करो, यही तक़वा के ज़्यादा क़रीब है।
(सूरह अल-माइदा: 8)
लेकिन अफ़सोस! इनकी वतनपरस्ती ने इनके इंसाफ़ को खा लिया। इनका दिल अब इंसाफ़ से नहीं, बल्कि नफ़रत से भर चुका है। ये लोग अब दुश्मनों की ज़बान बोलते हैं और इस्लाम की बुनियादी बातों को भी तोड़-मरोड़ कर पेश करते हैं।
ये "दारुलकुफ्र" और "दारुलइस्लाम" की अस्ल तफरीक को "उग्रवाद" कहते हैं। "जिहाद" को "आतंकवाद" कहते हैं। और तौहीद के सच्चे अलम्बरदारों को "गद्दार" कह कर खुद को हिन्दूत्व का गुलाम साबित करते हैं।
ये वही लोग हैं जो मुजाहिदीन को आतंकी कहते हैं, गुजरात, बाबरी और दिल्ली जैसे ज़ुल्मों पर चुप रहते हैं, लेकिन जब कोई मुसलमान भारत के ख़िलाफ़ एक हक़ की बात कर दे, तो आसमान सिर पर उठा लेते हैं।
अफ़सोस! ऐ मुसलमानो! तुमको क्या हो गया है
क्या वतन का झंडा अब मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के तौहीद के झंडे से बड़ा हो गया
क्या भारत की मिट्टी अल्लाह के दीन से ज़्यादा पाक हो गई
क्या तुम्हारी वफ़ादारी अब ईमान की जगह "वतन" के चारों तरफ़ घूम रही है
ऐ वो लोग जो भारत में इस्लाम की हिफाज़त का दावा करते हो
अगर तुम हक़ बोलने से डरते हो
अगर "दारुलकुफ्र" कहने पर तुम्हारा सीना तंग हो जाता है
अगर तुम्हारी ग़ैरत इस्लाम से ज़्यादा भारत से जुड़ी है
तो जान लो! तुम ग़ुलामी की आख़िरी हद तक पहुँच चुके हो।
तुम्हारे दिल वो मंदिर बन चुके हैं जहां "भारत माता" का बुत रखा जा चुका है
और तुम्हारी तक़रीरें वो आवाज़ बन चुकी हैं जिसमें "ला इलाहा इल्लल्लाह" की जगह "वतन, वतन" की गूंज सुनाई देती है।
याद रखो
जो क़ौम अपने ज़मीर को वतनपरस्ती की ज़ंजीरों में बाँध देती है
वो ना दीन बचा सकती है
ना इज़्ज़त
ना नस्ल
और ना ही अपनी आख़िरत।
(सूरह अल-माइदा: 8)
लेकिन अफ़सोस! इनकी वतनपरस्ती ने इनके इंसाफ़ को खा लिया। इनका दिल अब इंसाफ़ से नहीं, बल्कि नफ़रत से भर चुका है। ये लोग अब दुश्मनों की ज़बान बोलते हैं और इस्लाम की बुनियादी बातों को भी तोड़-मरोड़ कर पेश करते हैं।
ये "दारुलकुफ्र" और "दारुलइस्लाम" की अस्ल तफरीक को "उग्रवाद" कहते हैं। "जिहाद" को "आतंकवाद" कहते हैं। और तौहीद के सच्चे अलम्बरदारों को "गद्दार" कह कर खुद को हिन्दूत्व का गुलाम साबित करते हैं।
ये वही लोग हैं जो मुजाहिदीन को आतंकी कहते हैं, गुजरात, बाबरी और दिल्ली जैसे ज़ुल्मों पर चुप रहते हैं, लेकिन जब कोई मुसलमान भारत के ख़िलाफ़ एक हक़ की बात कर दे, तो आसमान सिर पर उठा लेते हैं।
अफ़सोस! ऐ मुसलमानो! तुमको क्या हो गया है
क्या वतन का झंडा अब मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के तौहीद के झंडे से बड़ा हो गया
क्या भारत की मिट्टी अल्लाह के दीन से ज़्यादा पाक हो गई
क्या तुम्हारी वफ़ादारी अब ईमान की जगह "वतन" के चारों तरफ़ घूम रही है
ऐ वो लोग जो भारत में इस्लाम की हिफाज़त का दावा करते हो
अगर तुम हक़ बोलने से डरते हो
अगर "दारुलकुफ्र" कहने पर तुम्हारा सीना तंग हो जाता है
अगर तुम्हारी ग़ैरत इस्लाम से ज़्यादा भारत से जुड़ी है
तो जान लो! तुम ग़ुलामी की आख़िरी हद तक पहुँच चुके हो।
तुम्हारे दिल वो मंदिर बन चुके हैं जहां "भारत माता" का बुत रखा जा चुका है
और तुम्हारी तक़रीरें वो आवाज़ बन चुकी हैं जिसमें "ला इलाहा इल्लल्लाह" की जगह "वतन, वतन" की गूंज सुनाई देती है।
याद रखो
जो क़ौम अपने ज़मीर को वतनपरस्ती की ज़ंजीरों में बाँध देती है
वो ना दीन बचा सकती है
ना इज़्ज़त
ना नस्ल
और ना ही अपनी आख़िरत।