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क्या कोई मुसलमान काफ़िरों की फौज में शामिल हो सकता है

ابو داؤد

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اپریل 27، 2020
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क्या कोई मुसलमान काफ़िरों की फौज में शामिल हो सकता है


بسم اللہ الرحمٰن الرحیم

आज हम ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ हर तरफ़ कुफ्र के झंडे लहरा रहे हैं, ताग़ूती अदालतें फैसले कर रही हैं, मुशरिकों के बनाये हुए कानून लागू हैं, और इन्हीं कानूनों की हिफाज़त को "वतन से मोहब्बत" का नाम दिया जा रहा है। इससे भी ज़्यादा ख़तरनाक वो मौलवी हैं जो दरबारी बन चुके हैं, ताग़ूत को मानते हैं, लोकतंत्र (डेमोक्रेसी) के पुजारी हैं, और सेक्युलरिज़्म के रखवाले हैं। ये लोग शैतान के फितने को इस्लाम की शक्ल में पेश करके आम मुसलमानों को गुमराह कर रहे हैं।

यही वो "बुरे उलमा" हैं जिन्होंने न सिर्फ़ उम्मत को ज़िल्लत (बेइज़्ज़ती) की तरफ़ खींचा, बल्कि खुद ताग़ूती हुकूमतों के सामने झुक कर उस ज़िल्लत को "शरीअत का हिस्सा" बना दिया। यही लोग आज काफ़िर फौजों में शामिल होने को "जिहाद", "वतन की सेवा", और "इस्लामी ग़ैरत" का नाम देते हैं।

अब हम इराक़ के फ़क़ीह, इमाम अबू हनीफ़ा रहमतुल्लाह अलैह का साफ़ और कड़ा फतवा पेश करते हैं

किताब "अल-अस्ल" के शुरू में मुहम्मद बिन हसन अश्शैबानी रह. कहते हैं​

"قد بينتُ لكم قول أبي حنيفة وأبي يوسف وقولي، وما لم يكن فيه اختلاف فهو قولنا جميعاً"

मैंने इमाम अबू हनीफ़ा, अबू यूसुफ़ और अपना मत साफ़ बता दिया है, और जिस मसले में कोई मतभेद नहीं, वो हम तीनों का इत्तेफाकी मत है।

मुहम्मद बिन हसन अश्शैबानी रहमतुल्लाह अलैह ने इराक़ के फक़ीह, इमाम अबू हनीफ़ा रहमतुल्लाह अलैह से सवाल किया​

"قلت: أرأیت القوم من المسلمین یکونون مستأمنین فی دار الحرب فیغیر علیہم قوم آخرون من أھل الحرب أیحل لمن ثم من المسلمین أن یقاتلوا معہم؟ قال: لا. قلت: لمَ؟ قال: لأن أحکام أھل الشرک ظاھرۃ غالبۃ، لأن المسلمین لا یستطیعون أن یحکموا بأحکام أھل الإسلام. قلت: فإن خاف المسلمون علی أنفسہم من ذلک العدو أیقاتلون دفعاً عن أنفسہم؟ قال: إذا کان ھکذا فلا بأس بالقتال لیدفعوا عن أنفسہم."

अगर कुछ मुसलमान कुफ्र के इलाके (दारुल-हरब) में अमान लेकर रहते हों, और उन पर किसी दूसरी काफ़िर कौम का हमला हो जाए, तो क्या उन मुसलमानों के लिए उनके साथ मिलकर लड़ना जायज़ है

इमाम अबू हनीफ़ा ने जवाब दिया
"नहीं, ये जायज़ नहीं है।"

सवाल हुआ: क्यों
तो उन्होंने फरमाया: क्योंकि वहाँ काफ़िरों के कानून और हुकूमत हावी है, और मुसलमान वहाँ इस्लामी हुकूमत नहीं चला सकते।

फिर सवाल हुआ: अगर मुसलमानों को अपनी जान का डर हो, तो क्या वो सिर्फ़ अपनी हिफाज़त के लिए लड़ सकते हैं


तो इमाम ने कहा: हाँ, अगर जान बचाने के लिए मजबूरी हो, तो अपनी हिफाज़त के लिए लड़ सकते हैं।

[किताब अल-अस्ल, जिल्द 7, सफा 491]

इससे साफ़ होता है जहाँ अल्लाह का कानून लागू नहीं होता, जहाँ इंसानों का बनाया हुआ कानून चलता है, वो "दारुल-इस्लाम" नहीं, बल्कि "दारुल-हरब" है। क्योंकि कुरान साफ़ कहता है

"हुक्म सिर्फ अल्लाह का चलेगा" ("إِنِ الْحُكْمُ إِلَّا لِلّٰہِ")

तो जहाँ लोकतंत्र (डेमोक्रेसी), सेक्युलरिज़्म और काफ़िरों का कानून लागू हो, वहाँ अल्लाह का हुक्म नहीं चलता। और जो लोग ऐसे सिस्टम की हिफाज़त करें —चाहे मौलवी हों या फौजी— वो ताग़ूत के नौकर हैं।

इमाम अबू हनीफ़ा ने कहा: जहाँ मुसलमान इस्लामी हुकूमत न चला सकें, वहाँ काफ़िरों के लिए लड़ना हराम है।

तो जो लोग काफ़िर झंडे को सलामी देते हैं, उनके गीतों पर परेड करते हैं, ताग़ूती अदालतों, संसदों और कानूनों की रक्षा करते हैं उनके साथ मिलकर लड़ना हराम है।

हाँ, अगर किसी मुसलमान को जान का खतरा हो, तो केवल अपनी जान बचाने के लिए लड़ सकता है , न कि काफ़िरों के झंडे, सिस्टम या फौज की हिफाज़त के लिए।

आज जो लोग फौजी वर्दी पहनकर मुसलमानों पर गोलियाँ चलाते हैं, इस्लामी कानून की मांग करने वालों को जेल में डालते हैं, और लोकतांत्रिक ताग़ूती हुकूमत की हिफाज़त करते हैं वो सब इस्लाम से फिरने वाले मुरतद हैं।

और जो तबलीगी जमात, जमाअत-ए-इस्लामी, या जमीअत अहले हदीस जैसे गिरोह इन ताग़ूती फौजों में शामिल होने को "इस्लामी सेवा" कहते हैं वो इस्लाम के गद्दार, शैतान के साथी, और हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की शरीअत के दुश्मन हैं।

मजलिस शूरा अल-मुजाहिदीन फी अल-इराक़ जिसके अमीर शेख अबू मुसअब ज़रक़ावी रहिमहुल्लाह और आधिकारिक प्रवक्ता शेख अबू अली अल-आनबारी रहिमहुल्लाह थे। इस की शरई कमेटी ने यह बयान दिया​

هؤلاء الطواغيت قد حكم الله تعالى بِكُفْر من تولاهم، فقال: {وَمَنْ يَتَوَلَّهُمْ مِنْكُمْ فَإِنَّهُ مِنْهُمْ} [المائدة، من الآية: 51] فمن دخلَ في أجنادهم من الشّرطة والجيش فقد ناصرهم أشدّ مناصرة وأقواها، ويكون بذلك قد حكم على نفسه بالردّة عن دين الله وإعلان الحرب على أوليائه، قال تعالى: {الَّذِينَ آمَنُوا يُقَاتِلُونَ فِي سَبِيلِ اللَّهِ وَالَّذِينَ كَفَرُوا يُقَاتِلُونَ فِي سَبِيلِ الطَّاغُوتِ فَقَاتِلُوا أَوْلِيَاءَ الشَّيْطَانِ إِنَّ كَيْدَ الشَّيْطَانِ كَانَ ضَعِيفاً} [النساء:76] .
"​

ये ताग़ूती हुक्मरान ऐसे लोग हैं जिनसे दोस्ती करने वाले को खुद अल्लाह ने काफिर करार दिया है। कुरआन में अल्लाह तआला फरमाता है: ‘तुम में से जो कोई उनसे दोस्ती करेगा, वह उन्हीं में से है’ (मायदा: 51)। इसलिए जो भी उनकी फौज या पुलिस में शामिल होता है, वह उनकी सबसे बड़ी मदद करता है। और ऐसा करके वह खुद को अल्लाह के दीन से फिर जाने वाला मुरतद बना लेता है और अल्लाह के दोस्तों से जंग का एलान करता है। कुरआन कहता है: ‘जो लोग ईमान लाए वे अल्लाह की राह में लड़ते हैं, और जो काफिर हैं वे ताग़ूत की राह में लड़ते हैं। तो शैतान के साथियों से लड़ो, बेशक शैतान की चाल कमजोर ही होती है।’ (निसा: 76)

(स्रोत: अस्सैफ़ वज़्ज़बह लि-मन दाख़ल फील शुर्ता वल-जैश)

इसका मतलब ये है कि दुनिया के जितने भी ताग़ूती और काफ़िर सिस्टमों के तहत काम करने वाली फौजें, पुलिस और सुरक्षा एजेंसियां हैं—चाहे वे किसी भी देश की हों, मुसलमान कहलाती हों या गैर-मुस्लिम—सब की सब काफिर और दीन-ए-इस्लाम से फिर जाने वाली मुरतद हैं।

भले ही उन्होंने इस्लामी वर्दी पहनी हो या ज़बान पर कलमा हो, लेकिन उनका असल काम ताग़ूती हुकूमत की खिदमत, अल्लाह के दीन के खिलाफ लड़ाई, मुजाहिदीन को दबाना, शरीअत मुहम्मदी के खिलाफ बनाए गए क़ानूनों की हिफाज़त और काफ़िरों के कानूनों को लागू करना है। इसलिए वे सब मुरतद (इस्लाम से पलटने वाले) और ज़िंदीक (दीन से धोखा देने वाले) हैं।

चाहे कोई आदमी भारतीय फौज का हो जो नमाज़ पढ़ता हो, रोज़े रखता हो, हज और उमरा करता हो, या फिर पाकिस्तानी फौज या पुलिस का हो जो पांच वक्त की नमाज़ का पाबंद हो और ज़ाहिर में दीन की बातें करता हो, अगर वह ताग़ूत के झंडे के नीचे, इस्लाम के खिलाफ जंग में शामिल है, तो उसने अपने काफिर होने का सबूत दे दिया है।

इनमें से कोई भी शख्स ना तो माज़ूर है और ना ही अलग रखा जा सकता है। ईमान वालों के लिए ज़रूरी है कि वे इन सबसे दुश्मनी रखें।

ये फौजें उस काफिर सिस्टम की हिफाजत करने वाले मुरतदों का गिरोह हैं, जिन्होंने खुल्लम खुल्ला इस्लाम से गद्दारी की है। ये वही लोग हैं जिन्होंने अल्लाह के दुश्मनों से दोस्ती की, दीन-ए-खालिस से बगावत की, शरीअत के हुक्मों को पैरों तले कुचला और दीन-ए-हक़ पर हमला करने वाले ताग़ूतों की लाइन में खड़े होकर अहल-ए-हक का खून बहाया।

इसलिए चाहे वो इंडियन आर्मी हो, पाकिस्तानी फौज हो, सऊदी नेशनल गार्ड हो, मिस्री सिक्योरिटी फोर्सेस हों या फिर अमीराती, जॉर्डन, तुर्की, अफगानी या ईरानी फौज जो भी ताग़ूती हुक्मरानों के तहत मुसलमानों पर ज़ुल्म करती हैं, अल्लाह की शरीअत को नहीं मानतीं, और काफिर कानूनों की रखवाली करती हैं ये सब काफिर, मुरतद, ज़िंदीक और क़त्ल के लायक हैं।

इनसे मोहब्बत रखना, इनकी हिमायत करना, इनसे नरमी रखना या इनकी हिफाजत को दीन की खिदमत समझना, ये सब कुछ खुद एक बहुत बड़ा निफाक (मुनाफिकत) और दीन से फिर जाना है।
 
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